धार्मिक

होली से जुड़ी अनोखी परंपरा, यहां रंगपंचमी के बाद होती है मेघनाद की पूजा

शाहरुख बाबा चीफ एडिटर 

स्वतंत्र हरदा। आदिवासी गोंड जनजाति समुदाय के लोग मेघनाथ को अपना इष्ट देव मानते हैं। जैसे अन्ना, जल, सूर्य और चांद को देवता के रूप में पूजा जाता है, उसी तरह मेघनाथ बाबा को प्रकृति स्वरूप पूजते हैं। इस मौके पर आयोजित मेले में समाज जन परिवार के साथ पूजन करते हैं। सर्व आदिवासी महिला संगठन अध्यक्ष राखी करोची ने बताया कि हमारे आदिवासी समुदाय में प्राकृतिक देवी-देवता की पूजा अर्चना की जाती है। पीड़ियों से हमारे पूर्वज मेघनाथ बाबा को पूजते आ रहे हैं। मेघनाथ बाबा का मेला गोंड जनजाति समुदाय की संस्कृति की पहचान है। मेघनाथ बाबा प्राकृतिक आराध्य देव है, गोंड आदिवासी समुदाय सामाजिक परंपराओं से अवगत कराने के लिए परंपरा का निर्वहन किया जाता है। उन्होंने बताया की यह त्यौहार प्रमुख रूप से प्रतीक ग्रामीण क्षेत्रों में वनांचलों में 15 दिनों तक चलता रहता है इसमें अन्य गतिविधियों एवं बालक वाले गांव द्वारा प्रस्तुतियां दी जाती है एवं आयोजन विभिन्न रूप से रखे जाते हैं आदिवासी समाज अपने त्योहारों को अन्य से अलग तरीके से मनाते हैं जो पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर होते हैं यह पुरानी प्रथा प्राचीन समय से चली आ रही है आज भी आप वनांचलों के ग्रामीणों में जाकर देखेंगे तो प्रत्येक गांव में आपको मेघनाथ झूला गांव के चौक में दिखाई देगा जो बहुत अनोखा एवं प्राकृतिक धरोहर सा प्रतीत होता है। ढोलक टीमकी और डंडार से नृत्य कर घर-घर जाकर फाग उत्सव मनाते हैं एवं यह त्यौहार सभी आदिवासियों का होता है गोंड कोरकू जनजाति वनांचलों में रहने वाले आदिवासियों का त्योहार यह परंपराएं विलुप्त होने की कगार पर है, इन्हें सहेज कर रखना चाहिए आदिवासी समाज को भिलाला समाज में जिस तरह आज विशाल रूप में भगोरिया मेला का आयोजन होता है जो होली के समय विशेष रूप से प्रतिवर्ष मनाया जाता है यह भी एक प्रमुख आदिवासी परंपरा है।

गोंडवाना इतिहास और विरासत ऐतिहासिक मेघनाद मेला की शुरुआत।

ऐतिहासिक मेघनाद मेला की शुरुआत जिले का ऐतिहासिक मेघनाथ मेले का आयोजन का आयोजन। होली के दिन खंडेरा बाबा के घूमने के साथ ही मेले की शुरुआत हुई। यह मेला हरदा जिला का ऐतिहासिक मेला है। इस मेले में हरदा जिले के अलावा अलग-अलग जिलों से लोग आते हैं। आदिवासियों यहां पर खंडेरा बाबा जिसमे स्वयं रावण के पुत्र मेघनाद का वास होता है। इस मेले में लोग पूजन-अर्चन कर अपनी मन्नतें मांगते हैं और पूरी होने पर खंडेरा बाबा की पांच खुटी चढ़ेंगे या फिर वीर बनकर गल पर घूमेंगे। वीर को खंडेरा तक ले जाने में जो बाजे बजाये जाते है उसकी अपनी एक धुन है जो सिर्फ मेघनाद मेले में ही सुनने को मिलती है।

हर वर्ष रंगपंचमी के कुछ दिन बाद मेघनाद को प्रसन्न करने के लिए मेले का आयोजन करते हैं आदिवासी होली को रंगों का त्योहार कहा जाता है, लेकिन इस त्यौहार से जुड़ी कई परम्परा आज भी समाज में विद्यमान है। इन्ही परम्पराओं में से एक है मेघनाद की पूजा। भगोरिया मेला मुख्य रूप से धार झाबुआ महू रतलाम भील प्रदेश में सांस्कृतिक रूप से फागुन माह में मनाया जाने वाला एक प्राचीन परंपरा है आज भी उसे भव्य रूप से मनाया जाता है। गोंड आदिवासी मेघनाद को अपना इष्ट देव मानकर उसकी पूजा करते हैं। मेघनाद बाबा को प्रसन्न करने के लिए आदिवासी प्रतिवर्ष रंग पंचमी से तेरस के बीच दो दिवसीय मेले का आयोजन करते हैं।

Swatantra Harda

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